नवरात्रि स्थापना- महत्व, व्रत और पूजा के बारे में जानकारी

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हिन्दू धर्म में किसी भी पूजा को कलश स्थापना के बिना अधूरा माना गया है। इसलिए नवरात्रि में भी पहले दिन मां दुर्गा के समक्ष कलश की स्थापना की जाती है। कलश स्थापना को घट स्थापना भी कहा जाता है। कलश को शांति और सृजन का संदेशवाहक माना जाता है।

मार्केट में हो रही चहल-पहल और मां दुर्गा की मूर्तियों से भरी शहर और गांव की गलियां, ये बताने के लिए काफी है कि नवरात्र नजदीक है। 2021 साल में नवरात्री 7 अक्टूबर को कलश स्थापना से शुरू होकर 15 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ संपन्न होगी। 7 अक्टूबर को कलश स्थापना के साथ भक्तजन नवरात्र के लिए व्रत रखना शुरू करेंगे। 

देश के अलग-अलग राज्यों में नवरात्रि को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। नवरात्रि को नवरात्रा, दुर्गापूजा, दशहरा, देवी पूजा जैसे नामों से भी जाना जाता है। नाम के साथ-साथ हर शहर में दुर्गापूजा को मनाने का तरीका का अलग-अलग है।

जो बात एक जैसी है कि वो ये है कि हर इंसान में दुर्गापूजा को मनाने का उल्लास एक जैसा ही दिखाई देता है। दुर्गा पूजा भक्तजनों के लिए एक बड़े उत्सव की तरह है। कई शहरों में 9 दिन गरबा का प्रोग्राम रखा जाता है तो कई शहरों में रावण दहन देखने के लिए हजारों लोगों की भीड़ लगती है। छोटी बच्चियाँ हर साल कन्या पूजन में जाने का इंतजार करती हैं। 

रंग-बिरंगी और स्वादिष्ट मिठाईंयों से बाजार सुगंधित रहता है। शॉपिंग के लिए सबसे बड़े सेल भी इसी वक्त मिलते हैं। भक्तजन, मां दुर्गा के लगातार नौ दिन पूरी आस्था के साथ आराधना करते हैं। इसकी शुरुआत पहले दिन कलश स्थापना के साथ की जाती है।

प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना या घट स्थापना के साथ नवरात्रि व्रत और मां दुर्गा की पूजा का संकल्प लिया जाता है। नवरात्रि के दिनों में कलश स्थपना का क्या महत्व है और नवरात्रि में कलश स्थापना कैसे होती है, आइए इसके बारे में जानते हैं!

नवरा​​त्रि 2021 में कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त (Navratri kalash sthapana 2021)

नवरा​​त्रि 2021 में कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त केवल 50 मिनट का ही है। पंचांग के अनुसार कलश स्थापना के लिए शुभ समय सुबह 06 बजकर 17 मिनट से सुबह 07 बजकर 07 मिनट तक ही है। भक्तजन इस समय के बीच में कलश स्थापना कर सकते हैं।

नवरा​​त्रि कलश स्थापना के लिए पूजा सामग्री

नवरात्रि कलश स्थापना के लिए आपको विभिन्न पूजा सामग्री की जरूरत पड़ सकती है :- 

  • मिट्टी का पात्र
  • लाल रंग का आसन
  • जौ
  • मिट्टी
  • चौड़े मुंह वाला मिट्टी का बर्तन (कलश)
  • मौली
  • गंगाजल
  • लौंग
  • कपूर
  • अक्षत
  • रोली
  • सुपारी (साबुत)
  • चावल
  • अशोका या आम के 5 पत्ते
  • नारियल
  • चुनरी
  • सिंदूर
  • फल-फूल
  • माता दुर्गा के लिए श्रृंगार-सज्जा
  • फूलों की खूबसूरत सी माला

कलश स्थापना कैसी की जाती है (Kalash Sthapna Vidhi) 

हिन्दू धर्म में किसी भी पूजा को कलश स्थापना के बिना अधूरा माना गया है। इसलिए नवरात्रि में भी पहले दिन मां दुर्गा के समक्ष कलश की स्थापना की जाती है। कलश स्थापना को घट स्थापना भी कहा जाता है। कलश को शांति और सृजन का संदेशवाहक माना जाता है। 

कलश स्थापना या घट स्थापना के लिए उत्तर-पूर्व दिशा को साफ कर लें। सफाई के बाद यहां मां दुर्गा की चौकी लगाएं। इसे बाद चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर पूरे मन के साथ मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित करें। मन में सबसे पहले भगवान गणेश की आराधना करें और फिर कलश को स्थापित करें। 

इसके बाद नारियल को चुनरी में अच्छी तरह लपेट लें। इसके साथ कलश पर मौली भी बांध दें। मौली को कलश के मुंह पर बाँधें। अब कलश में साफ जल या गंगा जल भर लें। इसमें लौंग का जोड़ा, सुपारी हल्दी की गांठ, दूर्वा और सिक्का डालें। अब कलश के ऊपर आम के पत्ते रखकर, उसके ऊपर नारियल को रखें। अब इस कलश को मां दुर्गा की दाईं ओर स्थापित करें। कलश की स्थपना करने के बाद ही मां दुर्गा का आह्वान प्रारंभ करें।

कलश स्थापना को किसी भी पूजा में बहुत शुभ माना जाता है और पूरे विधि-विधान के साथ भी किया जाता है। आप भी नवरात्रि में कलश स्थापना के वक्त पूरा ध्यान लगाएं और विधि के साथ इसे स्थापित करें।

कलश स्थापना के बाद देवी की पूजा भी पूरी विधि से की जाती है। देवी को चुनरी और समस्त शृंगार से सजाया जाता है। हर दिन मां दुर्गा को स्वादिष्ट पकवानों का भोग लगाया जाता है। मिठाइयों में बेसन के लड्डू बेहद प्रचलित है। दसवीं के दिन रावण दहन से दुर्गापूजा संपन्न होता है। आखिर में, पूरी श्रद्धा से मां दुर्गा को अगले साल फिर आने के लिए विसर्जित किया जाता है।

कलश स्थापना का महत्व (Kalash Sthapna Mahtv)

जैसा कि हमने ऊपर बताया कि हिंदू धर्म में किसी भी पूजा से पहले कलश स्थापना को बेहद शुभ माना जाता है। भक्तजन कलश स्थापना को पूरे विधि-विधान से निभाना अनिवार्य मानते हैं। कलश को ब्रह्मांड का, विराट ब्रह्म का, भू-पिंड का प्रतीक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि समस्त देवता कलश रूपी पिंड में समाए हुए हैं। एक बिन्दु, माध्यम या केंद्र से सभी देवताओं की आराधना और दर्शन के लिए कलश की स्थापना की जाती है।

कलश को सभी देव-देवी शक्तियों, तीर्थों स्थलों आदि का संयुक्त प्रतीक माना जाता है और इसे पूरे विधि-विधान के साथ स्थापित करके इसकी पूजा की जाती है। भक्तजनों का मानना है कि स्थापित कलश की पूजा करने से सभी देव शक्तियां एक साथ प्रसन्न होकर आपको आशीर्वाद देते हैं।

कलश में भरे हुए पवित्र जल को भरने का भाव यह है कि इंसान का मन भी इसी तरह पवित्र, निर्मल और निश्चल बना रहे। कलश के ऊपर मिट्टी के पात्र में रंग हुए अक्षत का भाव यह होता है कि ईश्वर भी अवतरित होकर हम अक्षत यानि अविनाशी आत्माओं को शुद्ध करें। आम के पत्तों का भाव हरियाली होता है। कलश में डाला गया दूर्वा-कुश, साबूत सुपारी, फूल इस भावना को दर्शाती है कि हमारी पात्रता यानि हमारे अंडर भी में दूर्वा (दूब) के समान जीवनी-शक्ति, कुश की तरह प्रखरता, सुपारी के जैसे गुणयुक्त स्थिरता, पुष्प की तरह उल्लास व खुशी और द्रव्य के समान सर्वग्राही गुण का समावेश हो।

सारांश 

दहशरा नजदीक है, ऐसे में भक्तजन देवी की पूजा कलश स्थापना के साथ शुरू करेंगे। कलश स्थापना के बाद, नवरात्रि शुरू हो जाती है। कई भक्तजन, नौ दिन का व्रत रखते हुए देवी मां से अपनी मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करते हैं। 

अस्वीकरण 

यहां दी गई जानकारी मान्यताओं और पंचांगों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति-विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है।

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